उत्तर प्रदेश का पहला FSTP प्लांट बनकर तैयार, मलबा निस्तारण की समस्या होगी दूर


उन्नाव: यूपी का पहला और देश का दूसरा एफएसटीपी (फिकल स्लज ट्रीटमेंट प्लांट) अपशिष्ट शोधन संयंत्र उन्नाव में बनकर तैयार हो चुका है. इस प्लांट के बनने के बाद अब उन्नाव को साफ और स्वच्छ रखने में बड़ी मदद मिलेगी. जल निगम ने  4.55 करोड़ की लागत वाले इस प्लांट का निर्माण अमृत कार्यक्रम के तहत किया है. इसके निर्माण की शुरुआत जनवरी 2019 में हुई थी. इस एफएसटीपी को जल्द ही उन्नाव नगर पालिका को हैंडओवर कर दिया जाएगा. उन्नाव के हुसैन नगर गांव में बने इस एफएसटीपी प्लांट का सफल ट्रायल हो चुका है.

यह प्लांट घरों में बने सीवर टैंक के स्लज को ट्रीट कर सॉलिड और लिक्विड को अलग करता है. जिसके बाद बचे सॉलिड वेस्ट का इस्तेमाल खाद्य के रूप में किसान कर रहे हैं. जबकि बचे लिक्विड का इस्तेमाल खेतों की सिंचाई के लिए किया जा रहा है. इस प्लांट में जब स्लज आता है तो उसका बीओडी 10 हज़ार मिलीग्राम प्रति लीटर होता है जबकि ट्रीट होने के बाद 10 मिलीग्राम प्रति लीटर रह जाता है. 

क्यों जरुरी है यह एफएसटीपी प्लांट
आपको बता दें कि उन्नाव जनपद में कहीं भी सीवर लाइन नहीं है, जिस कारण लोगों ने अपने-अपने घरों में ही सेप्टी टैंक बनवा रखे हैं और जब घरों में बने ये टैंक भर जाते हैं तो इन्हें खाली करने के लिए नगर पालिका से या निजी कंपनियों से टैंकर मंगवाकर स्लज घरों के टैंक से टैंकर में स्टोर करा जाता है. जिसके बाद ये टैंकर उस स्लज को ले जाकर नाले-नालियों और खेतों में फेंकर गंदगी फैलाते हैं. इस प्लांट के बनने के बाद ये समस्या दूर हो जाएगी. 

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जानिए क्या है इसकी प्रोसेसिंग?
सभी टैंकर स्लज को लाकर यहां बने स्क्रीन चैंबर में खाली करते हैं. इसे थिकनिंग टैंक में ट्रांसफर कर 3 दिन तक रखा जाता है. इसके बाद इस स्लज को थिकनिंग टैंक से स्टैब्लिलाइजेशन रिएक्टर में भेजकर 4 दिन तक ट्रीट किया जाता है. अगले स्टेप में स्क्रू प्रेस के माध्यम से ट्रीट किया जाता है. इस प्रक्रिया में लिक्विड और सॉलिड पूरी तरह से अलग हो जाता है. अगले स्टेप स्लज ड्राइंग बेड में अलग हुए सॉलिड को 8-10 दिन तक रखा जाता है. इस प्रक्रिया के बाद स्लज को इक़्वलाइजेशन टैंक में 1 दिन तक ट्रीट किया जाता है. 

वहीं दूसरी ओर बचे लिक्विड स्लज को अगले चैंबर एंटीग्रेटेड सेटलर में भेजकर इसे और ट्रीट किया जाने के बाद लिक्विड स्लज को प्लांटेड ग्रेवेल फिल्टर में ट्रीट किया जाता है. इस प्वाइंट में स्लज को ट्रीट करने के लिए पेड़ो का इस्तेमाल किया जाता है. यहां से ट्रीट होकर आगे बढ़ रहे लिक्विड को प्रेसर सैंड फिल्टर से होकर गुजारा जाता है इसके बाद एक्टिवेटेड कार्बन फिल्टर से लिक्विड वेस्ट गुजरता है. अंत से पॉलिसिंग पॉन्ड में इस बचे लिक्विड को स्टोर कर सिंचाई में इस्तेमाल किया जा जाता है.

खाद्य बनाने व सिचांई में भी है उपयोगी 
इस प्लांट में कई तरह के पेड़-पौधे लगाए गए हैं. जिनकी सिंचाई ‘टपक सिंचाई’ प्रणाली के तहत इस ट्रीटेड लिक्विड स्लज से की जा रही है. साथ ही अलग हुए सॉलिड स्लज का इस्तेमाल खाद के रूप में हो रहा है. इस प्लांट की सबसे खास बात यह है कि इसके संचालन में किसी तरह की बिजली का इस्तेमाल नही किया जा रहा हैं. करीब 13 किलोवाट के प्लांट का संचालन सोलर ऊर्जा के माध्यम से किया जा रहा है. इस प्लांट के अंदर ही 25 किलोवाट का सोलर प्लांट लगाया गया है.

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